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क्या पाकिस्तान को जोड़े रखेंगे नए आर्मी चीफ, ये हैं पहचान

पाकिस्तान में सेना और राजनीति को अलग-अलग करके देख स्थिति नामुमकिन है। पाकिस्तान बनने के बाद से ही यहां सेना राजनीति में प्रत्यक्ष या परोक्ष दखल देती है। कई बार कठिन परिश्रम में इस देश के लोग भी नेताओं से अधिक सेना पर भरोसा दिखाते हुए दिखाई देते हैं। वर्तमान पाकिस्तान एक ऐसा दौर से जर्जर है, जहां आर्थिक संकट है, बाढ़ की आपदा से हटे हुए देश की स्थिति गंभीर है और इन सब के बीच राजनीतिक संकट के बादल भी छाए हुए हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री मार्च लेकर पूरे देश में निकले हैं और ऐसे दौर में पाकिस्तान को सैयद आसिम मुनीर के तौर पर नई सेना प्रमुख मिल रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इमरान खान और सैयद आसिम मुनीर के रिश्ते सही नहीं रहे हैं। पहले भी इमरान खान, आसिम मुनीर को इसमें शामिल किया गया था, जिन्हें प्रमुखता से हटा दिया गया था।

दरअसल पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने लेफ्टिनेंट जनरल कॉम मुनीर को अगली सेना के प्रमुख के रूप में नियुक्त करने की मंजूरी दी है। सूचना मंत्री मरियम औरंगजेब ने इस बारे में बयान देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने अपने पास मौजूद शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इसका इस्तेमाल किया। जनरल मुनीर को देश का अगला सेना प्रमुख चुना गया है। उसी समय प्रधान मंत्री शाहबाज सरफराज ने राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद दी गई शुभकामनाओं को आबंटित किया। मुनीर, 29 नवंबर को शपथ ग्रहण कर दिखावे वाले जनरल कमर जावेद बजवा की जगह। ऐसे में जानते हैं कि नई सेना के प्रमुख का किसी चीज का सामना करना पड़ सकता है।

इमरान ही सबसे बड़ी चुनौती?

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ले। जनरल मुनीर को उनके पद से क्यों हटाया गया इस बात का खुलासा वहां के ही वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी ने एक साक्षात्कार के दौरान किया था। उन्होंने बताया कि साल 2019 में जनरल मुनीर ने आईएसआई प्रमुख के पद पर रहते हुए इमरान खान से कहा था कि उनकी पत्नी बुशरा बॉबी के सिस्टम में काफी भ्रष्टाचार कर रही हैं। जनरल मुनीर ने इसके सबूत के तौर पर कुछ दस्तावेज भी सौंपे थे।

सेना और सियासत का तालमेल बैठाएगा?

पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका का इतिहास बढ़ा हुआ है। पाकिस्तान की राजनीति में सेना का दखल साल 1947 से ही हो रहा है। बंटवारे के बाद से अब तक यानी 75 साल के दौरान सेना ने तीन बार यहां की सत्ता हथिया ली और तीन दशक से ज्यादा समय तक सीधे इस्लामिक गणराज्य पर शासन किया।

हाल यह है कि पाकिस्तान में जनता की तारीख हुई सरकार सत्ता में आती है, तब भी सेना सुरक्षा और विदेशी मामलों पर प्रभाव बनाए रखती है। आसान भाषा में ऐसे कहें तो पाकिस्तान की सेना के प्रमुख तय करेंगे कि भारत में हिंदू राष्ट्रवादी सरकार और अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार के साथ संबंध कैसे बनाए रखेंगे। साथ ही पाकिस्तान चीन या अमेरिका की ओर कितना झुकेगा इस पर भी वहीं फैसला करेंगे।

भारत के संबंध पर दोनों देशों की नजर होगी

पाकिस्तान में नए सेना प्रमुख की नियुक्ति के बाद उनकी सबसे बड़ी चुनौती भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध स्थापित करना होगा। खबर पड़ोसी देश के नए सेना प्रमुख पर भारत की भी करीब से नजर बनाए हुए है। नई सेना प्रमुख के हाथ में ही होगा की वह कश्मीर को लेकर कैसा रुख अपनाना चाहते हैं।

साल 2021 की शुरुआत में एलओसी पर भारत के साथ सीजफायर एग्रीमेंट की बहाली को बजाजा ने ही मंजूरी दी थी। लेकिन अब नई सेना के प्रमुख ये तय करने का अधिकार रखेंगे कि आने वाले वर्षों में एलओसी पर शांति रहेगी या सीजफायर का उल्लंघन किया जाएगा।

गृहयुद्ध जैसे हालात

पाकिस्तान में 47 साल में अब तक की सबसे भीषण बाढ़ आई है। रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि मुल्क का एक स्ट्रीम बाढ़ से प्रभावित हुआ है। कुदरत की मार जीत रहे पाकिस्तान को लेकर आशंका जा रही है कि किसी भी वक्त जनता का क्रोध फूट सकता है और वह सड़क पर उतर सकता है। अफवाह, भुखमरी, लोगों की घुसपैठ और आशंका की आशंकाओं ने देश को भारी संकट ला दिया है। गृहयुद्ध जैसे हो गए हैं।

ऐसी स्थिति की आशंका अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे आधार हैं। इसके पीछे बाढ़ जनित जीवाणुओं की वजह ही है, साथ ही पाकिस्तान की सियासत भी एक वजह है। पीएमएल-एन नेता शाहबाज शरीफ सरकार के खिलाफ पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी और उनका हेडहेड इमरान खान पहले से ही उग्र हैं। इन हालातों में भी वह सरकार को घोटालों का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि उन्होंने रेखा से रैली निकालने की चेतावनी सरकार को दी है। इमरान का आरोप है कि हुकूमत कर उनकी पार्टी के अकाउंट को खराब कर रहा है, जिसके विरोध में वह रैली निकालेंगे। ऐसे में सेना प्रमुख के तौर पर सैयद आसिम मुनीर की काफी बढ़ोतरी होगी।

कैसे होती है सेना की प्रमुख नियुक्ति

पाकिस्तान में सेना प्रमुख का कार्यकाल तीन साल का होता है, हालांकि हर बार किसी न किसी कारणवश इस अवधि को सींचा जाता है, जैसा कि जनरल बाज़वा के मामले में हुआ है। यहां सेना प्रमुख को अधिकार की प्रक्रिया इस तरह है कि अभिज्ञात होने वाले सेना प्रमुख देश के वर्तमान पीएम को वरिष्ठ जनरलों की एक सूची सौंपते हैं, जिसके बाद प्रधान मंत्री उनमें से किसी एक को चुनेंगे। हालांकि एक मौका ऐसा भी आया जब सेना में शीर्ष चार शीर्ष वरिष्ठ अधिकारियों को अनजान कर जूनियर को सेना के प्रमुख का पद दिया गया।

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